शुक्रवार 25 सितंबर 2026 - 17:39
ख़बर की तहक़ीक़ ईमान और अखलाक़ी ज़िम्मेदारी हैः हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद तहक़ीक़ हुसैन

अम्बा चौक भावनगर की शिया खोजा इसना अशरी जामा मस्जिद में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन सय्यद तहक़ीक़ साहब की इमामत में नमाज़-ए-जुमा अदा की गई। खुत्बा-ए-जुमा में उन्होंने तक़वा-ए-इलाही, इबादत और इताअत-ए-परवरदिगार की नसीहत करते हुए सूरह हुजुरात की आयतों के हवाले से खबरों की तहक़ीक़, अफ़वाहों से बचने और सामाजिक ज़िम्मेदारी पर विस्तार से प्रकाश डाला।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, अम्बा चौक भावनगर की शिया खोजा इसना अशरी जामा मस्जिद में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन सय्यद तहक़ीक़ साहब की इमामत में नमाज़-ए-जुमा अदा की गई। खुत्बा-ए-जुमा में उन्होंने तक़वा-ए-इलाही, इबादत और इताअत-ए-परवरदिगार की नसीहत करते हुए सूरह हुजुरात की आयतों के हवाले से खबरों की तहक़ीक़, अफ़वाहों से बचने और सामाजिक ज़िम्मेदारी पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की एक हदीस का उल्लेख करते हुए कहा कि नसीहत के लिए मौत ही काफ़ी है। इंसान को ग़फ़लत से जगाने और सीधी राह पर लाने के लिए हमेशा किसी बड़े भाषण या वाज़ की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मौत का तसव्वुर ही उसके लिए सबसे बड़ा वाज़, नसीहत और इबरत है।

मौलाना तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि वास्तविक बेनियाज़ी और अमीरी के लिए तक़वा काफ़ी है। इंसान जिस माल और दौलत के पीछे पूरी ज़िंदगी भागता रहता है, वह अस्थायी है। वास्तविक दौलत वह है जो इंसान के दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा करे और उसे सुकून प्रदान करे। इसी तरह व्यस्तता और समय गुज़ारने के लिए इबादत ही काफ़ी है।

भावनगर के इमाम जुमा ने कहा कि इंसान दुनिया में अपने लिए पनाहगाह तलाश करता है, लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने क़यामत को पनाहगाह के रूप में पर्याप्त बताया है। दुनिया की कठिनाइयां, नाइंसाफ़ियां और परेशानियां अस्थायी हैं, जबकि मोमिन के लिए वास्तविक और अंतिम न्याय का दिन क़यामत है।

उन्होंने कहा कि इंसान के अच्छे और बुरे कर्मों के बदले के लिए अल्लाह ही काफ़ी है। दुनिया में इंसान जब न्याय करने बैठता है तो कभी न कभी किसी व्यक्ति या पक्ष की ओर उसका झुकाव हो सकता है, लेकिन अल्लाह का न्याय पूर्ण और निष्पक्ष है। इंसान की ज़र्रा भर नेकी भी उसके सामने आएगी और ज़र्रा भर बुराई भी उससे छिपी नहीं रहेगी। यह संदेश इंसान को दुनिया के लालच से दूर करके उसे अपनी ज़िंदगी के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाता है।

क़ुरआन और तरबीयत के विषय पर उन्होंने सूरह हुजुरात की आयतों की व्याख्या करते हुए कहा कि इस सूरह में इंसान को सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के महत्वपूर्ण आदाब सिखाए गए हैं। सूरह की चौथी आयत के हवाले से उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सम्मान और अदब की अहमियत पर प्रकाश डाला।

मौलाना सय्यद तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि कुछ लोग पैग़म्बर (स) को उनके घर के दरवाज़े पर अदब और इंतज़ार के साथ आने के बजाय पीछे की ओर से आवाज़ देते थे और नाम लेकर पुकारते थे। क़ुरआन ने इस व्यवहार को अनुचित बताते हुए पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सम्मान और अदब की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी के घर या मुलाक़ात के लिए जाए तो उसे अदब के साथ दस्तक देनी चाहिए और इंतज़ार करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि सामने वाला व्यक्ति तुरंत बाहर आ जाए, क्योंकि वह किसी इबादत या दूसरे कार्य में व्यस्त हो सकता है।

खबर की तहक़ीक़ और अफ़वाहों से बचने की ज़रूरत

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद तहक़ीक़ ने सूरह हुजुरात की छठी आयत का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह तआला ईमान वालों को निर्देश देता है कि यदि कोई फ़ासिक़ व्यक्ति कोई खबर लेकर आए तो उसकी अच्छी तरह तहक़ीक़ कर लिया करो, ताकि अनजाने में किसी समुदाय को नुकसान न पहुंचा बैठो और बाद में अपने किए पर पछताना न पड़े।

उन्होंने कहा कि इस आयत में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि क़ुरआन एक ओर खबर की तहक़ीक़ और सच्चाई की पुष्टि करने का आदेश देता है, जबकि इसी सूरह की बारहवीं आयत में तजस्सुस से रोका गया है। पहली नज़र में दोनों बातों में अंतर दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में दोनों का संबंध अलग-अलग परिस्थितियों से है।

व्यक्तिगत जीवन में तजस्सुस हराम है

उन्होंने स्पष्ट किया कि तजस्सुस का अर्थ लोगों की निजी ज़िंदगी में ताक-झांक करना और उनकी व्यक्तिगत गतिविधियों की टोह लेना है। इंसान के निजी जीवन, घर के अंदर के मामलों और व्यक्तिगत गतिविधियों के बारे में अनावश्यक जिज्ञासा और खोजबीन से क़ुरआन ने रोका है। किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं कि वह दूसरों की निजी ज़िंदगी में झांकता रहे कि वे घर में कैसे रहते हैं और क्या करते हैं।

उन्होंने कहा कि जब मामला पूरे समाज और सार्वजनिक जीवन से संबंधित हो जाए तो स्थिति अलग हो जाती है। यदि समाज में कोई अफ़वाह फैल रही हो, कोई गलत सूचना सार्वजनिक रूप से प्रसारित हो रही हो या किसी खबर के कारण समाज को नुकसान पहुंचने की आशंका हो, तो उसके स्रोत और सच्चाई के बारे में जानकारी हासिल करना आवश्यक हो जाता है। ऐसी स्थिति में उद्देश्य किसी की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि समाज को नुकसान और गुमराही से बचाना होता है।

फ़ितने के डर से गलत बात को नज़रअंदाज़ करना समाधान नहीं

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद तहक़ीक़ ने कहा कि कभी-कभी यह सवाल उठता है कि यदि किसी गलत बात को रोकने से फ़ितने का डर हो तो क्या किया जाए? क़ुरआन इंसान को ग़ौर और फ़िक्र की दावत देता है। यदि किसी गलत सूचना या गुमराही को रोकने में फ़ितने का डर है, तो उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने के परिणामस्वरूप भविष्य में उससे भी बड़ा फ़ितना पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि ज़िम्मेदारी यह है कि बड़े फ़ितने को रोकने के लिए समय रहते उस छोटे फ़ितने का समाधान किया जाए, ताकि मामला वहीं समाप्त हो जाए और समाज को आगे होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।

आयत से मिलने वाली महत्वपूर्ण सीख

उन्होंने सूरह हुजुरात की उक्त आयत से मिलने वाली कई महत्वपूर्ण सीखों का उल्लेख करते हुए कहा:

  1. किसी संवेदनशील खबर, संदेश या मामले की पूरी तरह तहक़ीक़ और उसकी सत्यता की पुष्टि किए बिना उसे आगे प्रसारित करने या उसके आधार पर कोई निर्णय लेने से बचना चाहिए।
  2. किसी खबर को स्वीकार करने से पहले खबर लाने वाले व्यक्ति के चरित्र, उसके अतीत और उसके उद्देश्य को ध्यान में रखना आवश्यक है। आज के दौर में सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली खबरें भी इसी सिद्धांत के अंतर्गत आती हैं।
  3. गुस्से, जल्दबाज़ी या केवल अफ़वाह के आधार पर उठाया गया कदम दूसरों के लिए नुकसान का कारण बन सकता है।
  4. नादानी और बिना तहक़ीक़ के उठाया गया गलत कदम इंसान को बाद में गंभीर शर्मिंदगी और पछतावे से दोचार कर सकता है।
  5. यदि फ़ासिक़ व्यक्ति की खबर की पुष्टि करने का आदेश दिया गया है तो इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विश्वसनीय और न्यायप्रिय व्यक्ति की खबर को स्वीकार किया जा सकता है।
  6. शिया इल्म-ए-उसूल-ए-फ़िक़्ह में इस आयत से यह सिद्धांत लिया जाता है कि फ़ासिक़, नाफ़रमान और ग़ैर-आदिल व्यक्ति की खबर को बिना पुष्टि के स्वीकार नहीं किया जाता।
  7. इस आयत की बुनियादी शिक्षा यह है कि खबर सुनना आसान है, लेकिन उसकी तहक़ीक़ करना ईमान और अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी है।

फ़ासिक़ किसे कहा जाता है?

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद तहक़ीक़ ने फ़ासिक़ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि क़ुरआन में विभिन्न स्थानों पर फ़ासिक़ का उल्लेख हुआ है और अलग-अलग विशेषताओं के साथ इसकी व्याख्या की गई है।

उन्होंने कहा कि क़ुरआन और रिवायतों से जो निष्कर्ष सामने आता है, उसके अनुसार संक्षेप में फ़ासिक़ उस व्यक्ति को कहा जाता है जो खुले तौर पर गुनाह करता है, अल्लाह की आज्ञाओं की अवहेलना करता है और दीन का मज़ाक़ उड़ाता है। ऐसे व्यक्ति द्वारा कोई महत्वपूर्ण खबर प्रस्तुत की जाए तो उसे तुरंत स्वीकार करने के बजाय उसकी सच्चाई की पुष्टि करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में सोशल मीडिया के माध्यम से खबरें और संदेश बहुत तेज़ी से फैलते हैं। इसलिए हर मोमिन की ज़िम्मेदारी है कि वह किसी भी संवेदनशील खबर को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सच्चाई की जांच करे, ताकि उसकी वजह से किसी व्यक्ति, परिवार या पूरे समाज को नुकसान न पहुंचे।

खुत्बे के अंत में उन्होंने मोमेनीन को तक़वा-ए-इलाही अपनाने, इबादत और इताअत-ए-परवरदिगार को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने तथा क़ुरआन की शिक्षाओं को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में लागू करने की नसीहत की।

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